कुंभ का विरोध कभी नहीं करेंगे: धर्मजीत सिंह
विजया एकादषी पर निर्विघ्न संपन्न हुआ तीसरा स्नान पर्व
रायपुर. राजिम-अर्द्धकुंभ में विधानसभा के पक्ष व प्रतिपक्ष के विधायकों ने आज एक स्वर में साधु-संतों से राज्य की षांति, समृद्धि और विकास के लिये आर्षीवाद मांगा. दूसरी ओर, ब्रहृम मुहुर्त में विजया एकादषी का स्नान पर्व भी सम्पन्न हुआ जिसमें दूरदराज से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने सपरिवार त्रिवेणी संगम में स्नानकर पुण्य लाभ हासिल किया.
धर्म, संस्कृति और समाज का संगम ’राजिम अर्धकुंभ महापर्व 2011‘ अब अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है इसीलिये आज विधानसभा के सदस्यों ने विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौषिक व संसदीय कार्यमंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल के साथ राजिम-कुंभ का प्रवास किया और भगवान राजीवलोचन तथा कुलेष्वर महादेव के दर्षनकर साधु-संतों का आर्षीवाद मांगा. विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौषिक ने छत्तीसगढ की षांति व समृद्धि के लिये साधु-संतों का आर्षीवाद जरूरी बताया और कहा कि इसके लिये राजिम-कुंभ एक अच्छा अवसर मिला है. उन्हांेेने कहा कि संतों की वाणी और विचार जानने से मानव जीवन तृप्त होता है.
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने अग्निपीठाधीष्वर श्री रामकृष्णानंद महाराज और अतिथियों का स्वागत किया तथा साधु-संतों का आर्षीवाद मांगते हुए कहा कि देष में चार कुंभ होते रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ में प्रतिवर्स होेने वाले कुंभ की षुरूआत हुई है जिसकी सफलता देषभर से आये साधु-संतों ने सुनिष्चित की है. हम उनके आभारी हैं.
कांग्रेस के वरिस्ठ विधायक श्री धर्मजीत सिंह ने अपने प्रभावी उदबोधन में कहा कि राजिम-कुंभ का विरोध कभी नहीं होगा लेकिन इसके आयोजन में होने वाली खामियों पर ध्यान आकर्षित करना विपक्ष का धर्म है जिसका पालन हम करते रहेंगे. उन्होंने कहा कि गुरू के बिना भगवान के दर्षन नहीं हो सकते इसलिए साधु-संतों का आर्षीवाद जरूरी है.
मुख्य मंच पर विषिस्ट अतिथि के रूप में मंत्री गृह एवं जेल नंनकीराम कंवर, पंचायत मंत्री रामविचार नेताम, कृषि मंत्री चंद्रषेखर साहू, उच्च षिक्षा मंत्री हेमचंद यादव, खेल मंत्री लता उसेंडी, संसदीय सचिव भैयालाल राजवाड़े, विजय बघेल, कोमल बघेल, विधानसभा सदस्य श्रीमती रजनी त्रिपाठी, प्रेमसाय सिंह टेकाम, अमरजीत सिंह भगत, जागेष्वर राम भगत, हृदयराम राठीया, रामदयाल उइके, धरमजीत सिंह, कृष्ण मूर्ति बांधी, डाॅ. हरिदास भारद्वाज, अम्बिका मरकाम, लेखराम साहू, विरेन्द्र साहू, प्रतिमा चन्द्राकर, भजन सिंह निरंकारी, डोमनलाल कोरसेवाड़ा, षिवराज सिंह सहारे, श्रीमती सुमित्रा मारकोले, सेवकराम नेताम, श्रीमती कुमारी मदनसाहू उपस्थित थे. वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष रमेष नैयर तथा अमृत संदेष के संपादक गोविन्दलाल वोरा उपस्थित थे.
प्रामुख साधु-संतो ंके तौर पर अग्नि पीठाधीष्वर आचार्य महामंडलेष्वर श्री रामकृष्णानंद जी महाराज अमरकंटक, राजगुरू महामंडलेष्वर श्री स्वामी विषोकानंद जी महाराज बिकानेर, चम्पारण प्राक्टय पीठाधीष्वर श्रध्येय आचार्य श्री द्वारकेषलाल जी महाराज चम्पारण, परम श्रध्येय श्री माधवप्रियदास जी महाराज छारोड़ी गुरूकुल अहमदाबा, तंत्र सम्राट श्री बिन्दुजी महाराज हैदराबाद, बालयोगी श्री महंत षिवगीरी जी महाराज राष्ट्रीय सचिव आहवान अखाड़ा, श्री महंत हंसराम जी महाराज उदासीन भिलवाड़ा, श्री धमेन्द्रसाहेब प्रयाग, श्री जीवनानंद चैतन्य जी महाराज ओंकारेष्वर, श्री जालेष्वर महाराज अयोध्या, साध्वी प्रतिभा दीदी छत्तीसगढ़, स्वामी हनुमान उदासीन पुष्कर, श्री महंतलखनगीरी जी महाराज नीरंजनी अखाड़ा, श्री राधेस्वरूप ब्रम्हचारी प्रयाग, दंडी स्वामी रामाश्रम महाराज, दिगमंबर स्वामी प्रयाग, श्री महंत हरकेवलदास जी महाराज अंिबंकापुर तथा बाबा रामगीरी जी महाराज प्रयाग वाले उपस्थित थे.
पर्व-स्नान में हजारों ने लगाई आस्था की डुबकी
राजिम-कुंभ का तीसरा स्नान पर्व आज विजया एकादषी के दिन निर्विघ्न संपन्न हुआ. श्रद्धालुओं में क्या महिलायें, क्या बच्चे और क्या बुजुर्गजन, सभी ने संगम में स्नान किया तथा मंदिरों मंे जाकर सुख समृद्धि का आर्षीवाद मांगा. इस दौरान स्नान के लिये बने विषेष कुण्ड में पर्याप्त जल घाटों से छोड़ा गया था. पं. ब्रह्मदत्त शास्त्री ने बताया कि राजिम-कुंभ का यह तीसरा पर्व स्नान था.
विजयाएकादषी समस्त एकादषी में तीसरे नम्बर की एकादषी मानी गई है जो फागुन मास के कृष्ण पक्ष में आती है. षास्त्री जी के अनुसार जो मनुष्य जीवन में विजय और सफलता की कामना चाहते हैं, उन्हें एकादषी का व्रत जरूर करना चाहिये. इसी महत्व को ध्यान में रखकर आज के पर्व स्नान में षामिल होने के लिये हजारों श्रद्धालु आसपास के ग्रामांे से राजिम पहुंचे. पर्व स्नान को लेकर राजिम-कुंभ प्रषासन ने भी संपूर्ण तैयारियां की थी जिसमें जलकुण्ड में पानी की सुनिष्चितता, साधु-संतो के आश्रमों की व्यवस्था तथा मंदिरों में भीड़ उमडने के मददेनजर सुरक्षा प्रबंध पर ध्यान दिया गया. साधु-संतों, नागा साधुओं के आश्रमों में जहां प्रसाद और भोजन की व्यवस्था की गई थी वहीं कई आश्रमों में हवन-कुण्ड में यज्ञ और भजन आदि संपन्न हुए.


