बृजमोहन अग्रवाल – जीवन परिचय
BRIJMOHAN AGRAWAL
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एक नेता जो विपक्ष मे हो या सरकार मे, रहता हमेंशा आम जनता के दिलों में, और आम जन की आशा आकांक्षाओं, उसकी भावनाओं , उसकी पीड़ा ही जिसकी राजनीति के केन्द्र में रहे। यह पह्चान है चिरयुवा बृजमोहन अग्रवाल “Brijmohan Agrawal” की। अपनी इस राजनैतिक शैली के चलते उन्होने अपने विधान सभा क्षेत्र में ही नहीं पूरे राज्य में व राज्य से बाहर भी व्यापक लोकप्रियता व ठोस आधार बनाया है। मई दिवस १९५९ को जन्में बृजमोहन अग्रवाल “Brijmohan Agrawal” को अपने पिता रायपुर के प्रतिष्ठित व्यवसायी व समाजसेवी श्री रामजीलाल अग्रवाल का व्यसायगत उत्तराधिकार रास नहीं आया लेकिन अपने पिता व परिवार से मिले सामाजिक तथा मानवीय मूल्यों के सरोकार व संस्कार की विरासत को उन्होने बखूबी सहेजा।
भरे पूरे परिवार तक अपने आप को सीमित ना रखते हुए व्यापक समाज के लिये काम करने की ललक के चलते 1977 मे वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के माध्यम से छात्र राजतीति मे सक्रीय हुए। छात्रसंघ चुनावों मे व्याप्त विसंगतियों को दूर करने का उन्होंने बीड़ा उठाया। उनकी पहल को छात्र जगत ने हाथों हाथ उठाया और वे एकाधिक बार कालेज व विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गये। इस दौरान उन्होने महसूस किया कि राजनीति के माध्यम से अपनी नेतृत्व क्षमता का उपयोग करते हुए समाज व आम जनता के हित में बेहतर योगदान दे सकते है। इसी सोच के साथ वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के साथ जुड़ गये। 1986 में वे युवा मोर्चा के प्रदेश मंत्री व 1988 में प्रदेश उपाध्यक्ष
बनाए गये। इस दौर में उनकी सांगठनिक क्षमता , जुझारु नेतृत्व और सामाजिक राजनैतिक सोच को अभिव्यक्ति व स्वीकृति मिली। उन्होने अनेक जन आंदोलनों का नेतृत्व किया तथा भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से सक्रिय व प्रत्यक्ष राजनीति में प्रवेश किया।बृजमोहन अग्रवाल “Brijmohan Agrawal” ने राजनीति को सत्ता पाने का साधन कभी नहीं माना।उनके लिये राजनीति एक नई आर्थिक सामजिक संरचना के निर्माण का माध्यम रही। वे हमेशा विचारधारा व सिद्वांतो की राजनीति के पक्षधर रहे और अंत्योदय तथा एकात्ममानववाद के प्रति प्रतिबद्दता के साथ उन्होने भा.ज.पा “Accepted BJP” को आत्मसात किया।
उनकी कर्मठता और सक्रियता को देखते हुए 1990 के विधान सभा चुनाव मे रायपुर नगर विधान सभा क्षेत्र से पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया और वे पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। समाज व आमजन को लेकर को लेकर उनकी समझ चिंता ने उन्हें ऐसा जननेता बना दिया कि उसके बाद से अब तक वे लगातार ५वीं बार विधायक चुने गये।1990 में अविभाजित मध्य प्रदेश में पहली बार भा.ज.पा. की सरकार बनी और पहली बार विधायक बने श्री अग्रवाल “agrawal” को स्थानीय शासन , पर्यटन, तथा विज्ञान व तकनीकी विभाग का राज्यमंत्री(स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया। इस कार्यकाल मे उन्होने अपनी प्रशासनिक क्षमता का बखूबी परिचय दिया और उनकी गणना पार्टी के परिपक्व नेताओं मे होने लगी।
1993 व 1998 में वे विधायक चुने गये और इस एक दशक में उन्होंने”Brijmohan Agrawal” विपक्षी दल के विधायक की भूमिका पूरी मुखरता और गंभीरता के साथ निभाई। अविभाजित म.प्र. मे वे भा.ज.पा. विधायक दल के मंत्री व बाद में मुख्य सचेतक बनाए गये।
लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उनकी अटूट आस्था है और वे विधान सभा को ऐसा मंदिर मानते है जहां आम आदमी के हितों के लिये आराधना की जाती है।एम. ए., एम. काम., एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त बृजमोहन अग्रवाल मे सीखने-समझने की प्रवृत्ति हमेंशा बलवती रही। हर विषय पर गहन अध्यन,चिंतन,शोध,परामर्श आदि की प्रक्रिया से गुजरते हुए उन्होंने विधान सभा की बहसों को सार्थक आयाम दिया। विपक्षी दल का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने विधान सभा में अपनी बात इतने तर्कपूर्ण तरिके व ओजस्विता के साथ रखी कि सरकार को अपनी गलत नीतियों में परिवर्तन के लिये बाध्य किया जा सके।व्यक्तिगत आरोपों और प्रत्यारोपों से परे रह कर उन्होंने विपक्षी दल के सदस्य की सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करते हुए सार्वजनिक सरोकार व आम आदमी के हितों की दृष्टि से विधानसभा को सार्थक मंच बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विधान सभा में उनके श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिये उन्हें “Brijmohan Agrawal” 1997 में उत्कृष्ठ विधायक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
छत्तीसगढ राज्य बनने के पक्ष मे उन्होंने विधान सभा मे जो तर्कपूर्ण भाषण दिया वह छत्तीसगढ के प्रति उनके दर्द व लगाव की अभिव्यक्ती थी। नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य में उनका कार्यक्षेत्र् म.प्र. की तुलना मे सीमित हो गया लेकिन विपक्षी दल के विधायक के रुप में उनकी भूमिका और भी प्रभावी हो गई। छत्तीसगढ़ विधान सभा में लोकलेखा समिति , कार्यमंत्रणा समिति व विधेषाधिकार समिति के सदस्य रहते हुए अपने संसदीय व प्रशासनिक ज्ञान व अनुभव को परिमार्जित किया व विधान सभा की समितियों के कार्य संपादन में सार्थक योगदान दिया। वे रायपुर नगर वर्तमान में रायपुर दक्षिण विधान सभा क्षेत्र से लगातार 5 बार विधायक निर्वाचित हुए लेकिन उन्होंने कभी भी अपने को विधान सभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा और पूरे प्रदेश में उनकी सक्रियता बनी हुई है। इसी के चलते उनका “Brijmohan Agrawal”जनाधार और लोकप्रियता प्रदेश के कोने कोने में बनी हुई है।
उन्हें चुनावी राजनीति का अनुभवी नेता माना जाता है। उनके प्रभार में लड़े गये हर चुनाव ,उपचुनाव में भाजपा को सफ़लता मिली। यह सफ़लता उनकी चुनावी प्रबंधन क्षमता के साथ साथ आमजन से उनके जुड़ाव का परिचायक है।वे पार्टी के निष्ठावान और अनुशासित कार्यकर्ता है लेकिन आंतरिक लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था के चलते अपने विचार को व प्रतिक्रिया को प्रकट करने में उन्होंने कभी भी संकोच नहीं किया।2003 के चुनावों में पार्टी को विजयी बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छत्तीसगढ़ भाजपा में उनका शुमार वरिष्ठतम नेताओं में होता है और उनकी वरिष्ठता को देखते हुए 2003 में बनी भाजपा सरकार में उन्हें गृह सहित आधा दर्जन मंत्रालयों की जिम्मेंदारी दी गई। तब से अब तक उन्होंने गृह,जेल,श्रम,संस्कृति,पर्यटन,धर्मस्व, वन,राजस्व, विधि विधायी,खेल व युवा कल्याण आदि विभागों का दायित्व निभाते हुए वर्तमान में स्कूल, शिक्षा,लोक निर्माण, संसदीय कार्य,पर्यटन,संस्कृति व धार्मिक न्यास विभाग के मंत्री है। म.प्र. व छत्तीसगढ़ की सरकारों में लगभग 20 विभागों का दायित्व संभाल चुके वे एकमात्र मंत्री है।
हर दिन 14 से 16 घंटे काम करना व देर रात तक मिलने वाले हर व्यक्ति से मिलना तथा उनकी “Brijmohan Agrawal” मदद करना बृजमोहन अग्रवाल की कार्यशैली व व्यक्तित्व का वह पहलू है जिसका कायल हर कोई है और इसी के चलते धर्म, सम्प्रदाय, जाती. विचारधारा,सवर्ण,पिछड़े,दलित आदि विभाजनों से उपर हर वर्ग में उनके प्रशंसकों व समर्थकों की भीड़ मौजूद है।विचारों की भिन्नता के बावजूद व्यक्तिगत जीवन मे सौहाद्र पूर्ण व्यहार के चलते विरोधी दलों में भी उनका सम्मानजनक स्थान है । सार्वजनिक जीवन में शुचिता और रचनात्मकता के वे स्वयं उदाहरण है। अपने आपको नेता नहीं बल्कि एक कार्यकर्ता मानना उनके लिये मुहावरा नहीं जमीनी वास्तविकता है। छत्तीसगढ़ की माटी में रचे बसे बृजमोहन अग्रवाल “Brijmohan Agrawal” की चिंता मे एक तरफ़ छत्तीसगढ़ की लोक व आदिवासी संस्कृति ,परंपरा,पुरातत्व व लोक वैभव का संरक्षण व प्रोत्साहन शामिल है तो दूसरी ओर राज्य को जादू टोना , भूख, गरीबी से मुक्त कराते हुए गौरवशाली विकसित राज्य के रुप में स्थापित करना है। तदर्थवाद और यथास्थितिवाद(नौकरशाही) उन्हें कतई पसंद नहीं और वे दूरगामी परिणाम वाले गतिशील शासनतंत्र के पक्षधर है जिस पर व्यवहारिक रुप से नैकरशाही नहीं जनप्रतिनिधियों का नियंत्रण हो।