हाल ही में गुजरा राजिम-कुंभ 2012 इस बात का साक्षी बना है कि भौतिक जीवन की आपाधापी से मुक्त होकर कहीं शांति है तो वह है कुंभ जैसे आयोजन में तभी तो संत आशाराम बापू के प्रवचनों को सुनने दस लाख से ज्यादा श्रद्धालु राजिम-कुंभ दौड़ पड़े. राज्य सरकार का बड़ा दिल देखिये कि उसने वैलेंटाइन-डे जैसे पाश्चात्य पर्व को माता-पिता पूजन दिवस में तब्दील करके रख दिया.
अब इसमें दो मत नहीं रहे कि राजिम-कुंभ ने छत्तीसगढ़ को देश के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मानचित्र पर स्थापित कर दिया है! राजिम-कुंभ के आयोजन का मूल उद्देश्य और लक्ष्य, सृष्टि का कल्याण है और साथ ही यह भी कि त्रिवेणी संगम में रचा-बसा कुंभ, पवित्रता व शरीर शुद्वि के साथ हिन्दु समाज में एकता भी परिलक्षित हो. संत आसाराम बापू को सुनने के लिये जिस तरह भीड़ उमड़ी, उससे यह साबित हो गया है कि भौतिक जीवन की आपाधापी से मुक्त होकर कहीं शांति है तो वह है कुंभ जैसे आयोजन में.
किसी भी धार्मिक पर्व विशेषकर कुंभ का आयोजन हिन्दु संंस्कृति का अभिन्न अंग रहा है. हम सदियों से देखते आये हैं कि कुंभ जैसे धार्मिक आयोजन पवित्र नदियों के किनारे ही होते हैं. पवित्रता व शरीर शुद्वि के लिये कुंभ का आयोजन होता है और इसमें सृष्टि के कल्याण का हित होता है. राजिम-कुंभ ने भी इसी को सार्थकता प्रदान की है. महानदी, पैरी और सोढ़ूर नदियों के त्रिवेणी-संगम, जिसे छत्तीसगढ़ का प्रयागराज भी जाना जाता है- से राजिम-कुंभ जैसी सफलता निकली है. राजिम-कुंभ 2012 कई तरह की अमिट यादें और गौरवपूर्ण उपलब्धियां देकर गया है. अपनी मखमली आवाज में लिपटे प्रवचनों का रसपान कराने वाले देश के प्रख्यात संत आसाराम बापू की चार दिनों तक चली प्रवचन-माला ने पूरे छत्तीसगढ़ को अपनी ओर खींचा. बापू के ही शब्दों में : धर्म और राजनीति का अद्भुत समन्वय यदि किसी राज्य में देखने को उन्हें मिला तो वह है छत्तीसगढ़. बापू के सुझाव को राज्य सरकार ने इस कदर सर-आंखों पर रखा कि स्कूली शिक्षा मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने वैलेंटाइन-डे जैसे अपसंस्कृति फैलाने वाले विदेशी उत्सव को माता-पिता पूजन दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया और उसे पूरा कर दिखाया. छत्तीसगढ़ ऐसा करने वाला पहला राज्य बना है.
हजारों साधु-संत व दर्जनभर अखाड़ों की मौजूदगी में विराट ‘संत समागम‘ का शुभारंभ हुआ तो जगदगुरू शंकराचार्य ज्योतिष एवं द्वारकापीठाधीश्वर श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने संदेश में कहा कि अब तक देश में चार कुंभ ही आयोजित होते हैं लेकिन प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला राजिम-कुंभ देश का पहला कुंभ है. उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि साधु-संतों ने जिस रामराज्य की कल्पना देखी थी, उसे छत्तीसगढ़ सरकार ने साकार किया है जहां धर्म की गंगा बह रही है और साधु-संतों के सम्मान में पूरी सरकार खड़ी रहती है. बताते चलें कि अस्वस्थता के चलते जगद्गुरू शंकराचार्य संत समागम में शामिल नहीं हो सके. कुंभ में त्रिकालदर्शी अनंत विभूषित युवा संत श्री गुरूशरण जी महाराज ’पण्डोखर सरकार’ का त्रिकालदर्शी दिव्य दरबार आकर्षण का केंद्र बना रहा. मोह-माया में लिपटे श्रद्धालुओं को यहां जीवन का गणित खूब समझ में आया. संत डॉ. बिंदू महाराज के हाथों छत्तीसगढ़ के कौशल्या नंदन राम नामक पुस्तक का विमोचन भी हुआ.
संतों की उपस्थिति और उनके आर्शीवाद के बिना भला कुंभ कैसे सफल माना जा सकता है सो इस वर्ष मुख्य तौर पर महामंडलेश्वर स्वामी आनंद चैतन्य सरस्वती जी हरिद्वार, महामंडलेश्वर श्री स्वामी प्रेमानंद जी महाराज हरिद्वार, महामंडलेश्वर स्वामी शिव प्रेमानंद जी महाराज हरिद्वार, श्री मोहनदास जी महाराज रामायणी (हरिद्वार), परम श्रद्धेय महामंडलेश्वर स्वामी प्रेमानंद जी महाराज (मुम्बई), संत कवि श्री पवन दीवान जी महाराज, तपस्वी सत महात्यागी श्री बालकदास जी महाराज (पाटेश्वरधाम), त्रिकालदर्शी संत श्री गुरूशरण दास जी पंडोखर सरकार जी (झॉसी), आचार्य श्री स्वामी कपिलानंद जी महाराज (दिल्ली), श्रद्धेय आचार्य श्री जालेश्वर जी महाराज (अयोद्धया), डॉ. स्वामी श्री बिंदु जी महाराज (हैदराबाद), दण्डिस्वामी श्री सच्चिदानंद तीर्थ जी महाराज (बिलासपुर), श्री महंत स्वामी दयानंद गिरीजी महाराज (काशी), श्रद्धेय स्वामी जीवानंद जी महाराज (इंदौर), श्री ब्रम्हाचारी विवेकानंद जी महाराज (काशी), श्रद्धेय स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य जी महाराज (वृंदावन), महंत श्री साधवी रंजना देवी जी (हरिद्वार), ब्रम्हकुमारी पूज्य पुष्पा बहनजी (नवापारा), श्री महंत माता दर्शना ज्योति जी (हरिद्धार), श्री महंत पुरी बेन (हरिद्धार), श्री महंत राधा रश्मि माता (हरिद्वार), श्री महंत ललिता गिरी जी माता (हरिद्वार), श्री श्रद्धेय गोपाल शास्त्री जी (वाराणसी), आचार्य श्री जालेश्वर जी महाराज अयोध्या, स्वामी नारायनानंद जी महाराज माटुंगा मुंबई महाराष्ट्र, तांत्रिक योगी श्री रमेश जी महाराज इलाहबाद, पू. माता दर्शना ज्योति जी हरिद्वार, साध्वी अरुणा भारती जी छतरपुर, ब्रह्म कुमार श्री नारायण भाई, साध्वी रंजना दीदी उत्तरकाशी, डॉ.स्वामी जीवनानंद चैतन्य जी महाराज आदि की उपस्थिति से कुंभ गुलजार रहा. एक हजार से ज्यादा नागा साधुओं ने स्थानीय दत्तात्रेय मंदिर में भगवान श्री दत्तात्रेय की पूजा अर्चना कर अपनी पेशवाई दी. इसके पूर्व त्रिवेणी संगम के मुक्ताकाशी मुख्य मंच पर संत समागम किया गया जिसमे साधू संतो ने ओजस्वी प्रवचन दिए. अंचल के विधायक अमितेष शुक्ल ने राजिम को धार्मिक नगरी बताते हुए कहा कि देशभर से आये साधु-संतों ने इसकी गरिमा और महत्ता बढ़ाई है.
बात आस्था की डुबकी की करें तो कुंभ में श्रद्धालुओं की रिकार्डतोड़ भीड़ उमड़ी. चारों पर्व स्नान के दिन परंपरा और विश्वास का प्रगटीकरण करते हुए लाखों श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम पर डुबकी लगाई. आयोजन की संरक्षक बनी राज्य सरकार से लेकर आम आदमी तक ने भगवान राजीवलोचन व कुलेश्वर महाराज की पूजा अर्चना करते हुए उनका अभिषेक और पुण्यलाभ हासिल किया. महामहिम राज्यपाल शेखर दत्त, विधानसभाध्यक्ष धरमलाल कौशिक, मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह, श्रम मंत्री चंद्रशेखर साहू, नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे, सांसद चंदूलाल चंद्राकर, विधायक अमितेष शुक्ला, संत पवन दीवान, जिला पंचायत अध्यक्ष अशोक बजाज और नगर पालिका अध्यक्ष अंजना महाडिक़ आदि ने राजिम-कुंभ में शिरकत कर पुण्यलाभ कमाया.
इस बार का आयोजन सामाजिक समरसता का साक्षी भी बना. सामाजिक कार्यकर्ता रेहाना खान के नेतृत्व में 50 मुस्लिम महिलाओं का समूह राजिम कुंभ दर्शन को आया और सामाजिक एकता और सद्भाव का अनुपम उदाहरण रखा. संत समागम में तीन दिनों तक स्वामी ज्ञान स्वरूपानंद ‘अक्रियजी के सान्निध्य में चला कामधेनु यज्ञ तथा महामेरू पीठ के दण्डी स्वामी सच्चिदानंद महाराज के सरस्वती यज्ञ का लाभ श्रद्धालुओं ने उठाया. श्रद्धालुओं को प्रसिद्ध प्रवचनकार पं. विजयशंकर मेहता को भी सुनने को मिला. उन्होंने पूरे तीन दिन तक महाभारत और रामायण पर आधारित प्रवचन दिये और संदेश दिया कि यदि भक्त को भगवान का आर्शीवाद मिल जाये, उसके अमर हो जाने की सोच गलत है क्योंकि मृत्यु इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है. नेता प्रतिपक्ष रवीद्र चौबे की अध्यक्षता और संस्कृति एवं धर्मस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विशिष्ट आतिथ्य मे गौ-वंश की रक्षा और प्रदेश में रामराज्य की कल्पना साकार करने के संदेश के साथ इस यादगार महोत्सव का समापन हुआ.
सांस्कृतिक आयोजनों पर आयें तो राजिम-त्रिवेणी संगम में स्थित मुक्ताकाशी मंच पर पहली और यादगार प्रस्तुति भजन सम्राट अनूप जलोटा की रही जिनके भजनों को सुनकर सहसा बचपन से लेकर यौबन तक याद आ गया. भगवान राम पर आधारित महानाटक मर्यादा पुरूषोत्तम भी इस वर्ष के सांस्कृतिक आयोजन की यादगार उपलब्धि रहा. ध्वनि, प्रकाश और 100 से ज्यादा कलाकारों के अभिनय पर केंिद्रत इस नाट्यलीला का आनंद हजारों लोगों ने उठाया. लगभग दो घंटे के इस महानाट्य में भगवान राम के सम्पूर्ण जीवन को उतारा गया है. साथ ही ममता चंद्राकार के लोकगीत, बाबी मण्डल के भजन, मोना सेन का लोकमंच और मुंबई के प्रसिद्ध भजन गायक चरन जीत सिंह के भजनों ने राजिम-कुंभ को चमक प्रदान की. सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में जय प्रकाश के भजन और अनु सिन्हा के फ्यूजन कत्थक ने समां बांधा. अन्य प्रस्तुतियों में अश्वनी दुबे हाथ खोज का भजन, सुनीता भाले, खैरागढ़ भजन, चेतन देवांगन, पाहादा पंडवानी, दीपक चंद्राकर, अर्जुन्दा लोकमंच, ममता शिंदे दुर्ग का लोकमंच छाया रहा. स्थानीय श्री शिरडी सांई दरबार से भव्य पालकी यात्रा, गीत नृत्य एवं बैड बाजों की धुनों के साथ नगर भ्रमण कर कुलेश्वर मंदिर पहुंची. वृंदावन मथुरा से पधारे संत श्री सुभाष जी महाराज ने गाय और संस्कृति को बचाने का संदेश दिया.
छत्तीसगढ़ लोक गायन कुंभ के सांस्कृ़तिक मंच को आत्मीय रस में भिंगोने का केन्द्र बना रहा. छत्तीसगढ़ की अन्तराष्ट्रीय कलाकार तीजन बाई के पण्डवानी गायन और अभिनय ने महाभारत की बेजोड़ जीवंत प्रस्तुति दी. लोकगीत गायिका सीमा कौशिक तथा धनबाद के भजन गायक सुशील बाजेजा की प्रस्तुतियों ने कुंभ के सांस्कृतिक मंच को सार्थकता प्रदान की. खेमबाई की पंडवानी, खुशीदास मानिकपुरी का चैका, टोमिनबाई की पंडवानी, भिलाई के प्रभंजय चतुर्वेदी का भजन, रायपुर के दुकालु यादव का जगराता, कोलका के डॉ. पुनुराम साहू का लोकमंच, रायपुर के मनोज सेन का लोकमंच तथा दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र नागपुर के कलाकारों की दर्जनभर से अधिक प्रस्तुतियों ने कुंभ के सांस्कृतिक उद्देश्य को खासी आभा प्रदान की. कलाकारों की सुनें तो आर्थिक समस्या के चलते जिन लोक कलाकारों को बहुत कम अवसर और सम्मान राशि मिलती है, यह कुंभ उनके लिये मददगार साबित हुआ है. उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों के कलाकारों ने अभिनय और संगीत की ऐसी प्रस्तुतियां दीं कि दर्शकों और श्रद्धालुओं को देश की सांस्$कृतिक एकता का गर्वीला बोध हुआ. भजन गायक राजेन्द्र जैन, लोक कलाकार तीजनबाई और दक्षिण मध्यक्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का जिक्र किये बिना सांस्कृतिक योगदान की बात पूरी नहीं हो सकती. इस वर्ष भी देश-प्रदेश से आये पांच हजार से अधिक कलाकारों के लिये यह कुंभ उन्हें आगे बढऩे और कुछ कमा लेने का बेहतर अवसर प्रदान किया.

























































































