
प्राकृतिक सौंदर्य और बहुरंगीय संस्कृति भी राज्य की पहचान
छत्तीसगढ़ का प्राकृतिक सौंदर्य विलक्षण है। यहां के प्राकृतिक, धार्मिक, पुरातात्विक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थल पर्यटकों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करते हैं। छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक रूप से भी समृध्द राज्य है। लोक कला,लोक संगीत,लोक नाटय, लोक गीत,लोक नृत्य और लोक शिल्प के विविध रंग अपनी अलग पहचान लिए हुए है। छत्तीसगढ़ राज्य में पर्यटन के विकास के लिए पिछले आठ सालों में काफी तेजी से काम हुए हैं।
भारत के हदयस्थल में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर में सतपुड़ा पहाड़ियों का उच्चतम भू-भाग है तो मध्य में महानदी तथा उसकी सहायक नदियों का मैदानी भाग है इसके दक्षिण में बस्तर का विस्तृत पठार है। छत्तीसगढ़ प्राचीन स्मारकों,दुर्लभ वन्य प्राणियों,नक्कासीदार मंदिरों, ,बौध्द स्थलों राजमहलों जलप्रपातों,गुफाओं एवं शैल चित्रों से परिपूर्ण है। राज्य का 44 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। छत्तीसगढ़ अपने आप में पर्यटन के क्षेत्र में समृध्द राज्य है। यहां ऐतिहासिक,पुरातात्विक ,धार्मिक औद्योगिक केन्द्र,प्राकृतिक सौन्दर्य राष्टीय उद्यान एवं वन्य प्राणी अभ्यारण्य के साथ-साथ गौरवशाली आदिम संस्कृति का अद्वितीय उदाहरण देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ को प्रमुख धार्मिक पर्यटन राज्य बनाने की दिशा में सरकार को आशातीत सफलता मिली है। राज्य की प्राचीन एवं तीर्थ नगरी राजिम के त्रिवेणी संगम में हर वर्ष लगने वाले राजिम मेले को देश के कुंभ मेला के रूप में प्रतिस्थापित करने में सफलता मिली है। छत्तीसगढ़ के प्रयाग के रूप में प्रसिध्द राजिम के पखवाड़े भर के मेले में देश भर के साधु संतों सहित लाखों श्रध्दालुओं ने भागीदारीकर राजिम कुंभ की गरिमा व प्रतिष्ठा प्रदान की। शंकराचार्यों व महामंडलेश्वरों की उपस्थिति ने यह आश्वस्त किया कि आगामी वर्षों में राजिम कुंभ देश का प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन होगा। कुंभ मेले के प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन को वैघानिक स्वरूप देने के लिए छत्तीसगढ़ विधानसभा में छत्तीसगढ़ कुंभ मेला विधेयक 2006 पारित किया गया है। इसी प्रकार यहाँ के प्रमुख धार्मिक आस्था और विश्वास के केन्द्रों में आने वाले श्रध्दालुओं की सुविधा के लिए इन केन्द्रो में बुनियादी सुविधाओं के विकास पर अधिक ध्यान दिया गया।
सिरपुर को प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने व्यापक कार्य योजना तैयार की गई है। इसके लिए केन्द्र सरकार से चार करोड़ रूपये की स्वीकृति मिली है। इसमें से तीन करोड़ 18 लाख रूपए राज्य सरकार को प्राप्त हो गए हैं। सिरपुर में मोटल निर्माण किया जा रहा है। राज्य के 21 स्थानों पर पर्यटक विश्राम गृह (मोटल) तैयार कर लिया गया है। राज्य में पर्यटन विकास की असीम संभावनाओं को देखते हुए पर्यटक प्रोत्साहन योजना घोषित किया जा चुका है। । इसमें निजी निवेश द्वारा नवीन पर्यटन परियोजनाओं जिसमें मोटल, रिसार्ट, काटेज, मनोरंजन पार्क, वाटर पार्क, थीम पार्क, मल्टीप्लेक्स गोल्फ कोर्स, सफारी, साहसिक पर्यटन एण्ड वाटर स्पोर्टस शामिी है। इनकी स्थापना को प्रोत्साहित करने विलासिता कर, मनोरंजन कर, विद्युत शुल्क एण्ड स्टाम्प शुल्क में छूट का प्रावधान किया गया है। । इसी प्रकार इस योजना के अन्तर्गत भू-प्रीमियम शुल्क, भू-उपार्जन परिवर्तन शुल्क, भू-आबंटन सेवा शुल्क में छूट एवं भूमि बैंक योजना का प्रावधान भी योजना में है। राज्य की पुरातात्विक संपदा से परिपूर्ण राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के 116 स्थल चिन्हित किए गए है। पर्यटन विभाग द्वारा चिन्हित किए गये इन स्थलों में बस्तर के चित्रकोट जलप्रपात, प्राचीन सभ्यता के केन्द्र सिरपुर, भगवान वल्लभाचार्य की जन्म स्थली चम्पारण्य तथा तीन नदियों के संगम स्थल धार्मिक नगरी राजिम शामिल हैं।
यहां अधोसंरचना विकास पर 3 वर्षो में 100 करोड़ रूपये खर्च करने की योजना बनायी गयी है। बारनवापारा, अचानकमार, चित्रकोट में रिसॉर्ट तैयार किये गए हैं। मैनपाट, राजमेरगढ़, चिल्पी में रिसॉर्ट निर्माणाधीन है। नया रायपुर क्षेत्र में होटल प्रबंधन संस्थान निर्माणाधीन है। देश-विदेश के पर्यटकों को छत्तीसगढ़ के पर्यटन आकर्षणों के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से राज्य में माना एयरपोर्ट रायपुर पुरखैती, जगदलपुर, चम्पारण्य, राजिम के अलावा धमतरी, रायपुर और बिलासपुर, डोंगरगढ़ रेल्वे स्टेशन तथा राज्य के बाहर दिल्ली, कोलकाता, नागपुर, भोपाल, अहमदाबाद, विशाखापटनम में पर्यटन सूचना केन्द्रों की स्थापना की गई है। पर्यटकाें को पर्यटन स्थलों की जानकारी प्रदान करने हेतु डिस्कवरी चैनल के माध्यम से छत्तीसगढ़ के पर्यटन केन्द्रों पर फिल्म का निर्माण एवं प्रसारण किया गया । सुविधाजनक टेलरमेड पैकेज टूर प्रारंभ किये गये है। बस्तर के नगरनार में ग्रामीण परिवेष पर आधारित क्राफ्ट विलेज विकसित किया गया। चित्रकोट में साहसिक गतिविधियों का आयोजन किया गया। पर्यटकों के लिए सुविधाएं विकसित करने जल संसाधन और लोक निर्माण विभाग के 18 विश्राम गृहों व निरीक्षण गृहों का हस्तांतरण छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल को किया गया। राज्य के प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के 27 स्थानों पर यात्रियों की सुविधा के लिए सुलभ शौचालय का निर्माण पूर्ण कर लिया गया है। पर्यटकों की सुविधा के लिए पर्यटन स्थलों एवं उनके पहुंच मार्गों पर दिषा सूचक एवं जानकारी परक सूचना फलकों की स्थापना की है। प्रदेश में पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाओं के विकास के साथ-साथ प्रमुख पर्यटन स्थलों के सौन्दर्यीकरण, उन्नयन, पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण और पुर्नरूध्दार के लिए उल्लेखनीय योजनाएं शुरू की हैं। एक नवंबर 2000 को देश के 26 वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ की शुरूआत पर्यटन क्षेत्र में एक तरह से शून्य से हुई थी। इससे बुरी स्थिति क्या होगी कि विश्व प्रसिध्द कई स्थलों के इस क्षेत्र में होते हुए भी एक भी घोषित पर्यटन स्थल नहीं था। पर्यटन विभाग की कुछ परिसंपत्तियां जरूर थी लेकिन वह भी खस्ताहाल स्थिति में थी। अब राज्य में 100 से अधिक पर्यटन स्थलों को चिन्हाकित किया गया है। राज्य में राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के अनेक स्थल चिन्हित किए गए है । राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों में 18 स्थानों पर हाईवे मोटल बन गए हैं। इनमें कांपा (महासमुन्द),केन्द्री रायपुर,भाठागांव धमतरी,खपरी दुर्ग,तुमड़ीबोड़ राजनांदगांव,सरगांव बिलासपुर,कोनकोना कोरबा,चदीरमा सरगुजा,चिरगुड़ा कोरिया,नथियानवागांव कांकेर,कोण्डागांव बस्तर,कोड़ातराई रायगढ़,चित्रकोट बस्तर, हारम दंतेवाड़ा और कुलीपाटा जांजगीर-चांपा शामिल हैं। राज्य के प्रमुख रविशंकर जलाशय को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की योजना क्रियान्वित की जा रही है। जिसके अन्तर्गत मोटल निर्माण, गार्डन विकास, फौव्हारा निर्माण और बोटिंग की सुविधा उपलब्ध करायी गई है। आदिवासी बहुल्य क्षेत्र बस्तर के ग्राम आसना में टूरिस्ट कम्फर्ट सेंटर वे-साइड एमिनिटी एवं हर्बल रिसार्ट का निर्माण किया जा रहा है। राज्य की प्रमुख धार्मिक स्थल डोंगरगढ़ में यात्रियों की सुविधा हेतु अतिथि गृह के निर्माण के लिए 62.5 लाख रूपये जारी किया गया है। जिला मुख्यालय जगदलपुर के शहीद पार्क में ढोकरा क्राफ्ट राष्ट्रीय संग्रहालय निर्माण के लिए भूमि का चयन कर लिया गया है। बस्तर की इंद्रावती नदी में स्थित प्रसिध्द चित्रकोट जलप्रपात के सौन्दर्य को और निखारने, के लिए उद्यान विकसित किया गयाहै।
प्राचीन नगरी सिरपुर के समग्र विकास के लिए टाक्स फोर्स का गठन किया गया है। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के समन्वय से इस पुरातात्विक धरोहर को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। प्रदेश सरकार ने केन्द्र सरकार की अनुमति के बाद सिरपुर के 2 टीलों के 8 स्थलों पर उत्खनन किया गया इसमें 1 महल, 3 शिवालय, 3 रिहायशी स्थल एवं 1 बौध्द विहार निकले हैं। राज्य सरकार ने सबसे पहले यहाँ के पर्यटन महत्व के स्थलों को चिन्हाकित कर इन सब के विकास के लिए मास्टर प्लान तैयार करने का निर्णय लिया। पर्यटन क्षेत्र की विशेषज्ञ कम्पनियों की सलाह ली गई और अब मास्टर बनकर तैयार है। प्लान के आधार कई स्थानों पर अधोसंरचना विकास के काम शुरू हो चुके हैं। इस केन्द्र के महत्व को देखते हुए ही देश में पहली बार छत्तीसगढ़ सरकार ने इस स्थल के पुरा-अवशेषों की खुदाई के लिए लायसेंस हालिस कर लिया है। इस कार्य को स्वयं राज्य सरकार के हाथ में लेने से उत्खनन का काम बगैर किसी बाधा के चल रहा है। खुदाई से अभी तक जो तथ्य सामने आये हैं उससे प्रतीत होता है कि यह केन्द्र नालंदा से भी बड़ा स्थल हो सकता है। सिरपुर प्राचीन कोसलपुर की राज्य की राजधानी रही हैं। सिरपुर को विश्व विरासत के नक्शे में लाने की पुरजोर कोशिश हो रही हैं। इको टूरिज्म के तहत मैनपाट, कैलाश गुफा, तीरथगढ़, कांकेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, बारनवापारा, सीतानदी, उदन्ती अचानकमार अभ्यारण्य तथा धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल राजिम, चम्पारण्य, डोंगरगढ़, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, दन्तेवाड़ा आदि स्थलों को विकसित करने का कार्य शुरू किया गया है। राज्य में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए गोवा की तर्ज पर यहाँ के लोक-कलाकारों की कला के प्रदर्शन के लिए विशेष महोत्सव आयोजित करने की योजना है। इसके साथ ही राज्य में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लिए उनके लोक-गीत, नृत्य और संगीत के प्रदर्शन हेतु अलग-अलग आयोजन शुरू किए गए है। राज्य में फैली पुरासम्पदा के सरंक्षण एवं संवर्धन की दिशा में पहल करते हुए राज्य संरक्षित महत्वपूर्ण 58 स्मारकों के अनुरक्षण एवं रासायनिक संरक्षण के कार्य किए गए। इनमें भोरमदेव, मड़वामहल, बालोद, ताला का मंदिर, सिरपुर, बारसूर का बत्तीसा मंदिर और डीपाडीह उल्लेखनीय है। छत्तीसगढ़ का कोई ऐसा गांव नहीं होगा जहां उत्खनन में पुरासम्पदा नहीं मिलेगी। इस वैभवशाली पुरासम्पदा के संरक्षण एवं प्रदर्शन हेतु प्रारंभिक चरण में राज्य के राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा, महासमुंद, कांकेर, सरगुजा, रायगढ़, कोरिया तथा बिलासपुर जिले में पुरातत्व संग्राहालय स्थापना के लिए धन-राशि मुहैय्या कराई गई है। राज्य की संस्कृति, परम्परा, पुरातत्व, पर्यावरण और जीव सृष्टि के विकास की कल्पना को साकार करने रायपुर से 20 कि.मी. दूरी पर रायपुर-जगदलपुर मार्ग में उपरवारा ग्राम के पास पुरखौती मुक्तांगन आकार ले रहा है।
राज्य के कलाकारों को प्रोत्साहित करने एवं कला के प्रचार-प्रसार हेतु वर्ष भर विभिन्न विधाओं के सांस्कृतिक समारोह आयोजित किए गए। आंचलिक कलाकारों मंच उपलब्ध कराने जिलों में आयोजन निरंतर किए जाते हैं। राज्य के पारम्परिक उत्सवों शिवरीनारायण उत्सव, चक्रधर समारोह, रामगढ़ उत्सव, राजीव-लोचन महोत्सव एवं लोक-मड़ई और मेलों के आयोजनों को अधिक आकर्षक बनाया गया है। राज्य के कलाकारों को देश के विभिन्न राज्यों में कला प्रदर्शन के अवसर उपलब्ध करवाये गए हैं। राज्य के ग्रामीण अंचलों के लोक कलाकारों की पहचान करने, उनका सम्मान करने तथा उन्हें कला प्रदर्शन के लिए मौका उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अभिनव योजना ‘चिन्हारी’ शुरू की गई। इस योजना के अन्तर्गत लोक-कलाकारों का सर्वेक्षण कर सूचीबध्द किया जायेगा। राज्य में पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए किए गए कार्य अपने आप में एक उपलब्धि है। राज्य सरकार द्वारा आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय ही नहीं विश्व पर्यटन के नक्शे में स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।