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 हम यह जानते है कि बेटी ब्याह होने के बाद एक क्षण मे ही किसी और घर चली जायेगी,उसकी पहचान बदल जायेगी बावजूद हम उसकी शिक्षा-दीक्षा उसकी परवरिश बगैर भेद-भाव के करते है.यही निष्कामता है.ऐसा ही भाव हमारे कर्मों मे जगे, फल की चिंता किये बगैर अच्छे कर्म करते चले और “मै” का त्याग तो निश्चित ही हमारा जीवन भी सुखमय होगा.यही श्रीमद भागवत का सन्देश है | प्रसंग के माध्यम से यह बात प्रख्यात कथा वाचक पं. विजय शंकर मेहता ने प्रदेश के धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के शंकर नगर निवास पर आयोजित श्रीमद भागवत कथा ज्ञान अनुष्ठान श्रीमद भागवत कथा ज्ञान सप्ताह के प्रथम दिवस मे व्यासपीठ से कही.इस अवसर पर प्रदेश के राज्यपाल शेखर दत्त एवं विधानसभा उपाध्यक्ष नारायण चंदेल श्रोता के रूप मे उपस्थित थे |

प्रदेश के धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के शंकर नगर निवास पर आयोजित श्रीमद भागवत कथा ज्ञान अनुष्ठान आज प्रारंभ हुआ.सर्वप्रथम आज श्री अग्रवाल व् परिजनों ने सिर पर कलश लेकर कलश यात्रा की और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अनुष्ठान प्रारंभ किया |

व्यासपीठ से अपने उद्गार व्यक्त करते हुए करते हए पं.विजय शंकर मेहता ने सर्वप्रथम महाभारत और भागवत मे अंतर बताते हुए कहा कि महाभारत की रचना मे जीवन का केंद्र मानव है.इसमें जीवन का खुला सत्य लिखा है जबकि भागवत के केंद्रबिंदु मे परमात्मा है इसमें नायक के रूप मे श्री कृष्ण है |यह हमें बेहतर जीने का मार्ग प्रदान करता है |

उन्होंने सर्वप्रथम राजा परीक्षित और सुखदेव से जुड़ा प्रसंग सुनाया.जिसमे 7 दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु होने वाली थी |राजा ने सुखदेव से भागवत कथा सुनने की इच्छा जताई.जब वे दोनों कथा मे मग्न थे ऐसे समय मे श्रीमद भागवत ग्रन्थ के वचनों से प्रभावित होते हुए सारे देवता प्रगट होकर राजा परीक्षित से भागवत ग्रन्थ ले जाने की इच्छा जताई और बदले मे उन्हें अमृत प्रदान करने का प्रलोभन दिया | इस मांग पर परीक्षित ने कहा उन्हें अमृत पीकर जीने की इच्छा नही अपितु भय पर विजय पाना उनकी अंतिम इच्छा है जिस अज्ञात भय से आप देवता भी सहम जाते है |

पं.मेहता ने कहा कि श्रीमद भागवत ही अज्ञात भय से व्यक्ति को मुक्त करता है.और ईश्वर के करीब ले जाता है.अज्ञात भय पर विजय पाना ही जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है  |

उन्होंने कथा के प्रथम दिवस का सूत्र “संयम” दिया और कहा कि जिंदगी है तो झंझट आएगी ही, इस सच को स्वीकार करते हुए हमेशा खुश रहना चाहिए यही भगवान कृष्ण का स्वभाव रहा है. महाभारत युद्ध के दौरान वे मुस्कुराते रहे और विचलित नही हुए पांडवों ने भी इसी मार्ग का अनुशरण किया था |साथ ही उन्होंने महाभारत के भीष्म पितामह प्रसंग पर कहा कि एक घटना मात्र से ही व्यक्ति को अच्छा और बुरा कह देना न्यायोचित नही है.परिस्थितियां को भी समझना जरुरी है | आज हमें भी आत्म विश्लेषण के साथ नजरिया बदलने की जरुरत है |